राष्ट्र-चिंतक और संगठन शिल्पी: माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ का जीवन दर्शन और योगदान

Sushil rawal
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माधव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी'

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को एक स्थानीय संगठन से निकालकर भारत के कोने-कोने में विस्तारित करने और उसके विचारात्मक धरातल को सुदृढ़ आधार प्रदान करने का श्रेय माधव सदाशिवराव गोलवलकर को जाता है, जिन्हें संघ परिवार तथा जनमानस में आदरपूर्वक ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के बाद संघ के दूसरे सरसंघचालक बने गुरुजी ने लगातार 33 वर्षों (1940 से 1973) तक संगठन का नेतृत्व किया। वे न केवल एक असाधारण संगठनकर्ता थे, बल्कि एक आध्यात्मिक साधक, प्रखर चिंतक, भाषाविद और दूरदर्शी विचारक भी थे।

Contents
1. प्रारंभिक जीवन, जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि2. शिक्षा, बीएचयू और ‘गुरुजी’ उपनाम का उद्भवबनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में अध्ययनअध्यापन और ‘गुरुजी’ नामकरण3. संघ से संपर्क और डॉ. हेडगेवार से भेंट4. आध्यात्मिक यात्रा: सरगाछी आश्रम और स्वामी अखंडानंद का सानिध्यरामकृष्ण मिशन और सरगाछी गमननागपुर वापसी और जीवन का निर्णय5. संघ का नेतृत्व: दूसरे सरसंघचालक की भूमिका6. ऐतिहासिक चुनौतियां और ऐतिहासिक निर्णय(क) द्वितीय विश्व युद्ध और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन(ख) देश का विभाजन और शरणार्थियों की सहायता (1947)7. 1948 का प्रतिबंध, जेल यात्रा और संघ का पुनरुत्थानसत्याग्रह और संविधान का निर्माण8. राष्ट्रीय संकटों में योगदान (1962 और 1965 के युद्ध)9. विविध क्षेत्रों में कार्य: संघ परिवार का वटवृक्ष10. वैचारिक दृष्टि, दर्शन और प्रमुख पुस्तकेंप्रमुख पुस्तकें11. जीवन के अंतिम वर्ष और महाप्रयाण12. गुरुजी का जीवन क्रम: मुख्य घटनाक्रम13. मूल्यांकन और विरासत

1. प्रारंभिक जीवन, जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

माधव सदाशिव गोलवलकर का जन्म 19 फरवरी 1906 (माघ कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत 1962) को महाराष्ट्र के नागपुर के पास स्थित रामटेक में हुआ था। उनके पिता का नाम सदाशिवराव गोलवलकर और माता का नाम लक्ष्मीबाई (जिन्हें घर में ‘ताई’ कहा जाता था) था। सदाशिवराव एक शिक्षक थे, जिसके कारण उनका स्थानांतरण अलग-अलग स्थानों पर होता रहता था।

गोलवलकर परिवार का मूल संबंध महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के ‘गोलवल’ गांव से था, जिसके आधार पर परिवार का उपनाम गोलवलकर पड़ा। माधव अपने माता-पिता की नौ संतानों में से केवल अकेले जीवित बचे थे; अन्य आठ भाइयों और बहनों की बाल्यावस्था में ही विभिन्न बीमारियों के कारण मृत्यु हो गई थी। इस कारण वे अपने माता-पिता के अत्यंत प्रिय थे, किंतु उनका लालन-पालन अत्यधिक अनुशासन और धार्मिक संस्कारों के वातावरण में हुआ।

बाल्यकाल से ही माधव अत्यंत मेधावी, कुशाग्र बुद्धि और जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि वे एक बार पढ़ी हुई पुस्तक को लंबे समय तक याद रख लेते थे।

2. शिक्षा, बीएचयू और ‘गुरुजी’ उपनाम का उद्भव

माधवराव की प्राथमिक शिक्षा नागपुर तथा छत्तीसगढ़ के दुर्ग एवं रायपुर में हुई। 1922 में उन्होंने चंदा (वर्तमान चंद्रपुर) से हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने नागपुर के हिसलोप कॉलेज में इंटरमीडिएट की शिक्षा ग्रहण की।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में अध्ययन

1924 में माधवराव उच्च शिक्षा के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) गए। वहां उन्होंने वनस्पति विज्ञान (Botany) और प्राणी विज्ञान (Zoology) में गहरी रुचि दिखाई। 1926 में उन्होंने बी.एससी. और 1928 में एम.एससी. (प्राणी विज्ञान) की उपाधि उत्कृष्ट अंकों के साथ प्राप्त की। बीएचयू में अध्ययन के दौरान वे पंडित मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आए, जिनकी देशभक्ति और सनातन संस्कृति के प्रति निष्ठा ने माधवराव के मन पर गहरा प्रभाव डाला।

माधव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' का जीवन दर्शन

अध्यापन और ‘गुरुजी’ नामकरण

एम.एससी. करने के बाद वे आगे के शोध के लिए मद्रास (चेन्नई) गए, किंतु पिता की सेवानिवृत्ति और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें शोध बीच में छोड़कर वापस लौटना पड़ा। 1930 में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ही प्राणी विज्ञान के प्राध्यापक (Demonstrator/Lecturer) के रूप में नियुक्त हुए।

विश्वविद्यालय में पढ़ाने के दौरान उनका अपने विद्यार्थियों के साथ बहुत आत्मीय संबंध बन गया। वे न केवल विद्यार्थियों को विज्ञान पढ़ाते थे, बल्कि उनके चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों और व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं पर भी ध्यान देते थे। उनकी पढ़ाने की अनूठी शैली, विद्वता और छात्रों के प्रति स्नेह भाव के कारण छात्र और अन्य प्राध्यापक उन्हें आदर से ‘गुरुजी’ कहकर पुकारने लगे। कालान्तर में यह शब्द उनके नाम का अभिन्न अंग बन गया।

3. संघ से संपर्क और डॉ. हेडगेवार से भेंट

बनारस में अध्यापन के दौरान ही 1931 में माधवराव का संपर्क बीएचयू के विधि (Law) छात्र भैयाजी दाणी के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में नागपुर में संघ की स्थापना की थी और वे बनारस में भी संघ का कार्य विस्तार करना चाहते थे।

जब डॉ. हेडगेवार बनारस आए, तब उनकी भेंट माधवराव गोलवलकर से हुई। डॉ. हेडगेवार की राष्ट्रभक्ति, निस्वार्थ सेवा भाव और संगठनात्मक दृष्टि ने गुरुजी को गहराई से प्रभावित किया। गुरुजी संघ की शाखाओं में जाने लगे और धीरे-धीरे संघ कार्य के प्रति समर्पित होते गए।

1933 में बीएचयू में उनका अनुबंध समाप्त होने के बाद वे नागपुर लौट आए। नागपुर आकर उन्होंने ‘सिटी लॉ कॉलेज’ से एल.एल.बी. (Law) की डिग्री प्राप्त की। इस दौरान नागपुर में वे डॉ. हेडगेवार के और अधिक निकट आए और संघ के दैनिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।

4. आध्यात्मिक यात्रा: सरगाछी आश्रम और स्वामी अखंडानंद का सानिध्य

माधवराव का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनके भीतर एक ओर तीव्र राष्ट्रप्रेम था, तो दूसरी ओर एक गहरी आध्यात्मिक तृष्णा भी थी। वे जीवन के गूढ़ सत्य, ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार की खोज में व्याकुल रहते थे।

रामकृष्ण मिशन और सरगाछी गमन

1936 में, अपने विधिक करियर और संघ के बढ़ते दायित्वों के बीच, गुरुजी अचानक सब कुछ छोड़कर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में स्थित सरगाछी आश्रम चले गए। यह आश्रम स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई और रामकृष्ण परमहंस के प्रत्यक्ष शिष्य स्वामी अखंडानंद जी महाराज का आश्रम था।

गुरुजी ने सरगाछी में स्वामी अखंडानंद जी की अनन्य निष्ठा और भाव से सेवा की। स्वामी अखंडानंद जी ने माधवराव की आध्यात्मिक तत्परता को पहचाना और 13 जनवरी 1937 को उन्हें दीक्षा दी। दीक्षा के बाद माधवराव ने संन्यासी वस्त्र (भगवा वस्त्र) धारण कर लिए और ध्यान, स्वाध्याय तथा सेवा में लीन हो गए।

“सरगाछी आश्रम का प्रवास गुरुजी के जीवन का टर्निंग प्वाइंट था। वहां उन्होंने सीखा कि व्यक्तिगत मोक्ष और समाज सेवा अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।”

माधव सदाशिव गोलवलकर

नागपुर वापसी और जीवन का निर्णय

फरवरी 1937 में स्वामी अखंडानंद जी का देहावसान हो गया। गुरुजी गहरे शोक और आत्ममंथन की स्थिति में नागपुर लौटे। वे दुविधा में थे कि संन्यास मार्ग पर आगे बढ़ें या समाज सेवा के मार्ग पर।

नागपुर लौटने पर डॉ. हेडगेवार ने उन्हें समझाया कि भारत जैसे देश में, जो गुलामी और सामाजिक विकृतियों से जूझ रहा है, समाज को संगठित करना और राष्ट्र की चेतना को जगाना ही सबसे बड़ा संन्यास और आध्यात्मिक कर्तव्य है। डॉ. हेडगेवार के तर्कों और स्वामी विवेकानंद के “आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” (अपने मोक्ष और जगत के कल्याण के लिए) के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए गुरुजी ने अपना संपूर्ण जीवन संघ के माध्यम से राष्ट्र सेवा में समर्पित करने का निर्णय लिया।

5. संघ का नेतृत्व: दूसरे सरसंघचालक की भूमिका

डॉ. हेडगेवार का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। उन्होंने गुरुजी की प्रशासनिक दक्षता, विद्वता, प्रखर व्यक्तित्व और अटूट निष्ठा को देखते हुए उन्हें 1939 में संघ का सरकार्यवाह (सामान्य सचिव) नियुक्त किया।

21 जून 1940 को डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया। अपनी मृत्यु से पूर्व डॉ. हेडगेवार ने एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट इच्छा व्यक्त की थी कि उनके बाद माधव सदाशिव गोलवलकर संघ का नेतृत्व संभालें। 34 वर्ष की युवा आयु में गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक का पदभार ग्रहण किया।

    डॉ. के. बी. हेडगेवार (संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक)
                      │
                      ▼ (21 जून 1940)
  एम. एस. गोलवलकर 'गुरुजी' (द्वितीय सरसंघचालक, 1940-1973)
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वैचारिक सुदृढ़ता    संगठनात्मक विस्तार   संबद्ध संगठनों की स्थापना
(विचार नवनीत)      (अखिल भारतीय शाखाएं)  (VHP, ABVP, BMS, आदि)

6. ऐतिहासिक चुनौतियां और ऐतिहासिक निर्णय

गुरुजी के 33 वर्षों के कार्यकाल में भारत कई बड़े ऐतिहासिक दौरों से गुजरा। द्वितीय विश्व युद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन, देश का विभाजन, स्वतंत्रता, महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध, और चीन तथा पाकिस्तान के साथ युद्ध—इन सभी संकटों में गुरुजी ने संघ का मार्गदर्शन किया।

(क) द्वितीय विश्व युद्ध और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान ब्रिटिश सरकार संघ की बढ़ती गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही थी। 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया, तब संघ ने प्रत्यक्ष रूप से एक संगठन के रूप में आंदोलन में उतरने के बजाय अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने की छूट दी। संघ का मुख्य ध्यान अपने कैडर को बचाकर रखने और भविष्य के संभावित विभाजन तथा गृहयुद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए शक्ति संचय करने पर था।

(ख) देश का विभाजन और शरणार्थियों की सहायता (1947)

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, तब पंजाब, सिंध और बंगाल में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़की। उस समय गुरुजी के निर्देशन में संघ के स्वयंसेवकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया।

  • हिंदुओं की सुरक्षा: पाकिस्तान वाले क्षेत्रों से आने वाले लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों की रक्षा, भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था के लिए संघ ने राहत शिविर लगाए।
  • कश्मीर का भारत में विलय: अक्टूबर 1947 में जब महाराजा हरि सिंह निर्णय लेने में संकोच कर रहे थे और कबायली वेश में पाकिस्तानी सेना ने आक्रमण कर दिया था, तब गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के अनुरोध पर गुरुजी स्वयं हवाई जहाज से श्रीनगर गए। उन्होंने महाराजा हरि सिंह से भेंट की और उन्हें अविलंब भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया।

7. 1948 का प्रतिबंध, जेल यात्रा और संघ का पुनरुत्थान

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। यद्यपि गोडसे का संघ से कोई आधिकारिक संबंध नहीं था, फिर भी तत्कालीन सरकार ने राजनीति प्रेरित कदम उठाते हुए 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। गुरुजी सहित हजारों स्वयंसेवकों को जेल में डाल दिया गया।

सत्याग्रह और संविधान का निर्माण

गुरुजी ने सरकार के इस कदम का शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ता से विरोध किया। संघ ने स्वतंत्र भारत का पहला सबसे बड़ा अहिंसक सत्याग्रह आयोजित किया, जिसमें 70,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने जेल यात्रा की।

सरकार द्वारा गठित जांच आयोगों (जस्टिस कपूर आयोग) ने बाद में संघ को गांधी जी की हत्या की साजिश से पूरी तरह बरी कर दिया। तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने संघ के सामने कुछ शर्तें रखीं, जिनमें संघ का एक लिखित संविधान बनाना प्रमुख था। गुरुजी ने संघ का औपचारिक संविधान तैयार करवाया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि संघ एक सांस्कृतिक और चरित्र-निर्माण करने वाला संगठन है, न कि कोई राजनीतिक दल।

12 जुलाई 1949 को सरकार ने संघ से प्रतिबंध हटा लिया और गुरुजी को ससम्मान रिहा कर दिया गया। प्रतिबंध हटने के बाद गुरुजी ने देशभर का दौरा किया और स्वयंसेवकों में पुन: नए उत्साह का संचार किया।

8. राष्ट्रीय संकटों में योगदान (1962 और 1965 के युद्ध)

गुरुजी का मानना था कि वैचारिक मतभेदों से परे हटकर राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता सर्वोपरि है। उन्होंने संकट के समय हमेशा सरकार को पूर्ण सहयोग दिया।

संकट / युद्धवर्षगुरुजी और संघ की भूमिका
चीन आक्रमण1962स्वयंसेवकों ने सीमाओं पर रसद पहुंचाने, यातायात नियंत्रण और रक्तदान में सेना की मदद की। प्रधानमंत्री नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ के 3000 स्वयंसेवकों को पूर्ण गणवेश में मार्च पास्ट करने के लिए आमंत्रित किया।
भारत-पाक युद्ध1965प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निमंत्रण पर गुरुजी ने सर्वदलीय बैठक में भाग लिया। स्वयंसेवकों ने दिल्ली में नागरिक सुरक्षा और सीमाओं पर द्वितीय रक्षा पंक्ति के रूप में कार्य किया।

9. विविध क्षेत्रों में कार्य: संघ परिवार का वटवृक्ष

गुरुजी ने महसूस किया कि केवल सुबह-शाम की शाखाओं से समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसलिए उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले स्वायत्त संगठनों की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:

  1. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP – 1949): छात्रों और युवाओं में देशभक्ति और शैक्षणिक सुधारों के लिए।
  2. भारतीय मजदूर संघ (BMS – 1955): दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व में मजदूरों के अधिकारों के लिए गैर-वामपंथी मजदूर संगठन।
  3. विश्व हिंदू परिषद (VHP – 1964): संत समाज, प्रबुद्ध वर्ग और विश्वभर के हिंदुओं को एकजुट करने तथा अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए।
  4. वनवासी कल्याण आश्रम (1952): जनजाति (आदिवासी) क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के लिए।
  5. विद्या भारती (1952): भारतीय मूल्यों और संस्कृति पर आधारित शिक्षा प्रदान करने वाले विद्यालयों की श्रृंखला।

10. वैचारिक दृष्टि, दर्शन और प्रमुख पुस्तकें

गुरुजी एक उच्च कोटि के विचारक और लेखक थे। उन्होंने मराठी, हिंदी और अंग्रेजी में गहन लेखन किया। उनके विचारों का मूल आधार सनातन धर्म, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मानव कल्याण था।

प्रमुख पुस्तकें

  • वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड (We or Our Nationhood Defined – 1939): इस पुस्तक में राष्ट्र की अवधारणा, सांस्कृतिक पहचान और भौगोलिक सीमाओं का विश्लेषण किया गया था। (हालांकि बाद में संघ ने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक बाबाराव सावरकर की कृति ‘राष्ट्र मीमांसा’ का अनुवाद/संक्षेपण थी)।
  • विचार नवनीत (Bunch of Thoughts): यह गुरुजी के भाषणों, लेखों और साक्षात्कारों का संकलन है। इसे संघ की वैचारिक मार्गदर्शिका (Ideological Bible) माना जाता है। इसमें राष्ट्र, समाज, संस्कृति, राजनीति, धर्म और विश्व-मानवता पर उनके विचार संकलित हैं।
  • राष्ट्र चिंतन (Ideas on the Nation): इसमें भारत की विदेश नीति, रक्षा नीति और आंतरिक सुरक्षा पर उनके विचार शामिल हैं।

अस्पृश्यता पर रुख: गुरुजी सामाजिक समरसता के प्रबल समर्थक थे। 1969 में उडुपी में आयोजित विश्व हिंदू परिषद के सम्मेलन में उन्होंने भारत के प्रमुख संतों को एक मंच पर लाकर यह ऐतिहासिक घोषणा करवाई: “न हिंदू पतिधो भवेत्” (कोई भी हिंदू पतित या अछूत नहीं है) और “हिंदवः सोदराः सर्वे” (सभी हिंदू सहोदर भाई हैं)।

11. जीवन के अंतिम वर्ष और महाप्रयाण

1970 के दशक की शुरुआत में गुरुजी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उन्हें कैंसर (उत्तर-मध्य गुर्दे का कैंसर) का पता चला। 1970 में टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई में डॉ. प्राणांतक की देखरेख में उनकी शल्यचिकित्सा (Surgery) हुई।

कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद गुरुजी ने आराम नहीं किया। वे अदम्य इच्छाशक्ति के साथ अंतिम समय तक देश भर का प्रवास करते रहे और स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते रहे। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में बालासाहब देवरस का चयन किया।

5 जून 1973 को नागपुर के रेशमबाग स्थित संघ मुख्यालय में 67 वर्ष की आयु में गुरुजी ने अंतिम सांस ली। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका दाह संस्कार रेशमबाग में डॉ. हेडगेवार की समाधि के पास ही किया गया।

12. गुरुजी का जीवन क्रम: मुख्य घटनाक्रम

वर्षमहत्वपूर्ण घटना
190619 फरवरी को रामटेक (महाराष्ट्र) में जन्म।
1928बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से एम.एससी. (प्राणी विज्ञान) की उपाधि।
1930-33बीएचयू में अध्यापन; ‘गुरुजी’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
1931संघ के संस्थापक डॉ. के. बी. हेडगेवार से प्रथम भेंट और संघ में प्रवेश।
1936-37सरगाछी आश्रम (बंगाल) में स्वामी अखंडानंद से दीक्षा और आध्यात्मिक साधना।
1939राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘सरकार्यवाह’ बने।
1940डॉ. हेडगेवार के निधन के पश्चात संघ के द्वितीय ‘सरसंघचालक’ नियुक्त।
1948गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध; गुरुजी की जेल यात्रा।
1949प्रतिबंध निष्प्रभावी हुआ; संघ के लिखित संविधान की स्वीकृति।
1962/65भारत-चीन और भारत-पाक युद्धों में राष्ट्र सेवा का नेतृत्व।
1964विश्व हिंदू परिषद (VHP) की स्थापना में मुख्य भूमिका।
19735 जून को नागपुर में देहावसान।

13. मूल्यांकन और विरासत

माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ आधुनिक भारत के उन विरले व्यक्तित्वों में से थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन निस्वार्थ भाव से राष्ट्र निर्माण में होम कर दिया।

जहाँ आलोचक उनके विचारों को एकपक्षीय या राष्ट्रवाद का अतिवादी रूप मानते हैं, वहीं उनके समर्थक उन्हें एक ऐसा युगदृष्टा मानते हैं जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक जड़ों को पुनः सींचने का काम किया। उन्होंने एक ऐसे कैडर-आधारित संगठन का निर्माण किया जो आज विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है।

उनका जीवन वाक्य था: “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें।” यह भावना आज भी लाखों स्वयंसेवकों को समाज सेवा और राष्ट्र रक्षा के लिए प्रेरित करती है।

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People without knowledge of their history, origin, and culture is like a tree without roots.
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