जब कश्मीर में घडिया आधा घंटा पीछे चलने लगी – कहानी कश्मीरी पंडितो की

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kashmiri pandit by sushil rawal
kashmiri pandit by sushil rawal

बहुत बड़े धोखे का दिन है १९ जनवरी. उन तमाम लाचारियों ,मजबूरियों और न भुलाने वाले दर्द का दिन, जब हमारे अपने लोग यानि कश्मीरी पंडितो अपने घरों से भाग जाने को मजबूर करते हैं. सरकार भी मुस्लिम वोट बैंक के लिए उनका साथ नहीं देती. फिर उनके अथा दर्द को भुला भी दिया जाता है. जी हा ये सब हमारे देश प्यारे भारत में ही हुआ है.

अप्रेल १९८८ की बात है इस्लामाबाद में टॉप सीक्रेट मीटिंग चल रही थी। अपनी बुलनद आवाज में राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक़ फरमाते है जेंटलमेन शक और सूबा की कोई गुंजाईश नहीं है हमारा एक और सिर्फ एक मिशन है कश्मीर की आजादी।  हमारे मुस्लिम कश्मीरी भाईओ को अब और अधिक समय भारत के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कश्मीरियों में कुछ हुनर है जिसका हम फायदा उठा सकते है पहला उनकी शातिर बुद्धि, दबाव सेह सकने की क्षमता, और तीसरा उनकी राजनितिक जागरूकता। हमे बस उन्हें साधन मुहया करने की जरुरत है। 

कश्मीरी पंडित
कश्मीरी पंडित – Sushil Rawal

माना जाता है की जनरल जिया ने इस ऑपरेशन का नाम दिया था ऑपरेशन टू पाक।  जिसका उद्देस्य था कश्मीर में भारत विरोधी भावनाओ को भड़काना।  १९८८ में एक प्लेन क्रैश में जिया की मोत हो गयी लेकिन जिया के जाने के बाद ऑपरेशन टू पाक जारी रहा जिसका पहला असर तो जिया की मोत पर ही दिखा ।  तब कश्मीर में जुलुस निकले जिसमे नारे लगाए गए की तमाशा नहीं ये मातम है। मातम यही तक सिमित नहीं रहा ये तब्दील हुआ हजारो कश्मीरी पंडितो की मोत और विस्थापन से। जिन्हे अपना घर बार सब कुछ छोड़ देना पड़ा और अपने ही देश में रेफ्यूजी बन कर दर दर भटकने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

इन सब की शरुआत तो १९८२ से ही होने लग गयी थी।  जब कश्मीर के मुख्यमंन्री शेख अब्दुल्ला की मोत हो गयी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की लीडरशिप उनके बेटे फारुख अब्दुल्ला के हाथ में आ गयी। सरकार को २ साल हुए थे की नेशनल कॉन्फ्रेंस में फुट पड गयी जिसका जिम्मेदार केंद्र की इंदिरा गाँधी सरकार को ठहराया गया। 

इन सब की शरुआत तो १९८२ से ही होने लग गयी थी।  जब कश्मीर के मुख्यमंन्री शेख अब्दुल्ला की मोत हो गयी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की लीडरशिप उनके बेटे फारुख अब्दुल्ला के हाथ में आ गयी। सरकार को २ साल हुए थे की नेशनल कॉन्फ्रेंस में फुट पड गयी जिसका जिम्मेदार केंद्र की इंदिरा गाँधी सरकार को ठहराया गया। इसके बाद कांग्रेस के सपोर्ट के गुलाम मोहमद शाह मुख्यमंत्री हुए सरकार पे पहले ९० दिन में से ७२ दिन तो कर्फ्यू ही लगा रहा।  तब इस दौर को गुल इ कर्फ्यू नाम दिया गया। 

शेख अबदुल्ला
शेख अबदुल्ला

कश्मीर में इसको लेके विरोध के स्वर उठे तो गुलाम मोहमद ने बहुसंखयक मुस्लिम आबादी को खुश करने के लिए एक खतरनाक निर्णय लिया।  एलान हुआ की जम्मू के नए सेक्टृयेट में एक पुराने मंदिर को गिरा के एक भव्य शाही मस्जिद बनायीं जाएगी। जब हिन्दू आबादी ने इसका विरोध किया तो मुस्लिम कठरपन्तियो ने एक नैरा दे दिया की इस्लाम खतरे में है। 

इस घटना के बाद ही अलगाववादियों ने कश्मीर घाटी में अपनी पेठ बनानी शरू कर दी इसमें सबसे आगे था जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानि JKLF जिसको पूरा सपोर्ट मिल रहा था पाकिस्तान से।  

१९८४ में ही कश्मीर में २ और घटनाये हुयी जिसने कश्मीर के हालात पर और गहरा असर डाला। पहला आतंकवादी मक़बूल भट की फांसी और दूसरा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या। इसके बाद १९८५ में शाहबानू प्रकरण हुआ और उसका राजनैतिक बैलेंस बनाने के लिए राजीव गाँधी ने बाबरी मस्जिद के ताले खुलवा दिया ताकि वह पूजा अर्चना शुरू हो सके। इस पुरे प्रकरण को कश्मीर में मौजूद अलगाववादियों ने खूब इस्तेमाल किया और वह विद्रोह के स्वर और उठे। 

इस साल अनंतनाग में हिन्दू मंदिरो को तोड़ने की घटनाये हुयी और कश्मीरी पंडितो की दुकानों पे हमले होने लगे। 

इसके बाद गुलाम मोहमद की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और मार्च १९८७ में कश्मीर में फिर चुनाव हुए। कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस मिल कर चुनाव लड़ रहे थे तब जम्मू कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टिया यही थी। इन दोनों के विरोध में जमाते इस्लामी ने कई संगठनों से मिल के एक पार्टी बनायीं उसे नाम दिया गया मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट MUF इनका कहना था की फारूक अब्दुल्ला ने दिल्ली के आगे घुटने तक दिए है। इसलिए वो कश्मीर को रेपरसेन्ट नहीं कर सकता। 

फारुख अबदुल्ला
फारुख अबदुल्ला

 इस चुनाव में ७५% वोटिंग हुए नतीजे में कांग्रेस और नेका को ६६ सीट मिली और MUF ४४ सीटों पे लड़ी थी और ३१% वोट मिलने के बाद भी ४ सीट ही जित सक। बड़ी मात्रा में वोट मिलने के बाद भी MUF को कम सीट मिली इसलिए इस चुनाव पे धांधली के आरोप लगे। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार MUF के ६०० कार्यकर्ताओ को जेल में डाला गया था। इस चुनाव के बाद फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री तो बने लेकिन कश्मीर घाटी के खाश वर्ग का लोकतंत्र से मोह भंग होता रहा। फारुख अब्दुल्ला ने भी बहुसंख्यक मुस्लिम को खुश करने के लिए कई विवादस्पद निर्णय लिए। जिसमे कई खुखार आतंकवादियों को जेल से रिहा किया गया जिसमे कई पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेके आये हुए भी थे। साल १९८९ के दिसंबर में एक और घटना हुयी जिसमे देश के तत्कालीन ग्रहमंत्री मुफ़्ती मोहमद सईद के बेटी रुबिया सईद को आतंकवादियों ने अगवा का लिया और आत्नकवादी JKLF से थे। ग्रह मंत्री के बेटी की रिहाई की एवज में ४ खुखार आत्नकवादियो को रिहा करना पड़ा। जिसे आतंकवादियों और कठरपन्तियो के मनसूबे और मजबूत हो गए और उन्होंने भारत समर्थक और देशप्रेमी लोगो को निशाने में लेना चालू कर दिया। सबसे आशान निशाना थे कश्मीरी पंडित.

kashmir pandit genocide

१९८९ वो पहला साल था जब कश्मीर के राजनैतिक कारणों से किसी की हत्या की गयी।  ऑगस्ट में नेशनल कॉन्फ्रेंस के युसूफ हलवाई को गोली मार दी गयी। और अगले ही महीने बीजेपी के नेता टिका लाल टपलू की हत्या हो गयी। इसके बाद ४ नोवेम्बर को हाई कोर्ट के जज नीलकंठ गंजु की गोली मार कर हत्या कर दी गयी। गंजु वही जज थे जिन्होंने आतंकवादी मक़बूल भट्ट को फांसी की सजा सुनाई थी। 

ये ऐसी घटना थी जिसने कश्मीरी पंडितो के मन में डर बसा दिया। धीरे धीरे कश्मीरी पंडितो के नामो की लिस्ट बाटी जाने लगी। अखबारों में अनाम सूत्रों ने सन्देश चाप दिए।  ५ जनवरी को हिज्बुल मुजाहिदीन ने आफताब अखबार में छपवाया की सरे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दे। अखबार अल साफा ने भी दोबारा इसी चीज को छापा और इसके बाद आया सबसे भयंकर दिन। 

19 जनवरी 1990

फारुख अब्दुल्ला की सरकार को राष्ट्रपति शाशन लग चूका था। और कश्मीरी पंडितो के लिए हालात बहुत ख़राब हो चुके थे। पंडितो कश्मीर छोड़ो जैसे नारे अब गल्ली मोहल्ले में सुनाई देने लगे और हिन्दू कश्मीरी पंडितो पे खौफ का माहौल छाने लगा। पंडितो के घरो की निशानदेही होने लगी बंदूकधारी मुस्लिम आतंकवादी धमकी देने लगे की घडी में टाइम आधा जानता पीछे कर लो जिसका मतलब होता है पाकिस्तान के टाइम के हिसाब से अपनी घडी का टाइम कर दो। वह से पंडितो का पलायन शरू हो गया।  जाते हुए पंडितो को कहा गया की अब वापस आओगे तो वीसा लेके आना पड़ेगा। 

सोचिये एक वयक्ति का जन्म मरण वही का है वही पैदा हुआ है और उसकी पीढ़िया वह रहती आयी है उस जगह पे वीसा लेके आने को कहा जा रहा। 

 Kashmiri pandit - Sushil rawal
Kashmiri pandit – Sushil rawal

१८ और १९ की रात घाटी के घरो की बत्तिया काट दी गयी। सिर्फ मस्जिद के लाउडस्पीकर बज रहे थे। जिनसे एलान हो रहा था की कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ कर चले जाये और औरतो लड़कियों को हमारे हवाले कर दिया जाये। 

वहां के आस-पास के मुस्लिम पड़ोसियों ने ने भी कोई सपोर्ट नहीं किया वो तो उल्टा हिन्दुओ का मजाक बनाने लगे और आपस में बात करने लगे की उसकी औरत में लुंगा उसकी बेटी में लूंगा और मजाक बनाने लगे। 

जागो जागो, सुबह हुई, रूस ने बाजी हारी है, हिंद पर लर्जन तारे हैं, अब कश्मीर की बारी है.

वहा गली गली में नारे चलने लगे 

हम क्या चाहते, आजादी.

आजादी का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लाह.

अगर कश्मीर में रहना होगा, अल्लाहु अकबर कहना होगा.

ऐ जालिमों, ऐ काफिरों, कश्मीर हमारा है.

यहां क्या चलेगा? निजाम-ए-मुस्तफा.

रालिव, गालिव या चालिव. (हमारे साथ मिल जाओ, या मरो और भाग जाओ.)

Kashmiri pandit
Kashmiri pandit

गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ. १५ दिनों तक रेप होता रहा उनका फिर बेरहमी मार दिया गया. ऐसी ही अनेको अनेक घटनाएं हुईं. पर उनका  तो कोई रिकॉर्ड नहीं रहा. किस्सों में रह गईं. एक मुस्लिम आतंकवादी बिट्टा कराटे ने अकेले २०  लोगों को मारा था. इस बात को वो मीडिया के सामने खुले आम बड़े घमंड से सुनाया करता. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट इन सारी घटनाओं में सबसे आगे था. 

हालात इतने खराब हो गए थे की कई कश्मीरी पंडितो ने अपना सब कुछ छोड़ के वह से निकलना चालू कर दिया। आकड़ो के मुताबिक लाखो पंडित घाटी छोड़ने को मजबूर हो गए या कर दिया गया। 

कश्मीरी पंडित राहुल पंडिता बताते है की पंडितो के मोत का सरकारी आकड़ा ७०० का है जबकि वास्तविक आकड़ा १०००० से भी ऊपर है। 

Kashmiri pandit
Kashmiri pandit

कई औरतो और छोटी छोटी बच्चियों के रेप मुस्लिम कठरपन्तियो ने किये जिसका कोई आकड़ा आज तक नहीं बताया गया। 

हिन्दू पंडित अपने ही देश में विस्थापित होके यहाँ वह भटकने लगे।  इनपे सबसे जयादा जुर्म किया सरकारों ने।  इन्हे ख़राब हालात के टेंट दिए गए उसमे ये कई साल रहे और जम्मू से दूँ एक एक कमरे के जर्जर रूम दिए गए। 

भारत एक ऐसा देश बना दिया गया जिसमे हिन्दू हितो की बात करना कम्युनल हो जाता है और मुस्लिम कट्टरता को पोषित करना सेक्युलर।

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Sushil Rawal – People without the knowledge of their past history, origin and culture is like a tree without roots.