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पुष्यमित्र शुंग: मौर्य साम्राज्य का अंत और शुंग वंश का उदय

पुष्यमित्र शुंग

पुष्यमित्र शुंग प्राचीन भारत के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली सम्राट थे, जिन्होंने मौर्य वंश के अंतिम शासक की हत्या कर शुंग राजवंश की स्थापना की। उन्हें भारतीय इतिहास में ‘वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक’ के रूप में जाना जाता है।

1. सत्ता का उदय

पुष्यमित्र शुंग मौर्य सम्राट बृहद्रथ की सेना के प्रधान सेनापति (सेनानी) थे। 185 ईसा पूर्व के आसपास, जब मौर्य साम्राज्य कमजोर हो रहा था और विदेशी आक्रमणों का खतरा बढ़ रहा था, पुष्यमित्र ने एक सैन्य परेड के दौरान सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर दी और स्वयं को राजा घोषित किया।

2. प्रमुख उपलब्धियां और विजय अभियान

पुष्यमित्र शुंग ने न केवल आंतरिक विद्रोहों को दबाया, बल्कि बाहरी आक्रमणकारियों से भी देश की रक्षा की:

  • यवनों (यूनानियों) पर विजय: पुष्यमित्र के शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यवन आक्रमणकारियों को पराजित करना था। उनके पोते वसुमित्र ने सिंधु नदी के तट पर यवन सेना को धूल चटाई थी।
  • विदर्भ की विजय: पुष्यमित्र ने विदर्भ (आधुनिक महाराष्ट्र का हिस्सा) के राजा यज्ञसेन को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार किया।

3. वैदिक धर्म का पुनरुत्थान

मौर्य काल (विशेषकर अशोक के समय) में बौद्ध धर्म को अत्यधिक राजकीय संरक्षण मिला था। पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता में आने के बाद ब्राह्मण धर्म (वैदिक परंपराओं) को पुनर्जीवित किया।

  • उन्होंने दो अश्वमेध यज्ञ किए, जिनका वर्णन अयोध्या के शिलालेखों में मिलता है।
  • प्रसिद्ध व्याकरणविद् पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे और माना जाता है कि उन्होंने ही इन यज्ञों को संपन्न कराया था।

4. कला और साहित्य

यद्यपि पुष्यमित्र को अक्सर बौद्ध ग्रंथों में एक कठोर शासक के रूप में चित्रित किया गया है, लेकिन उनके काल में कला का विकास हुआ।

  • भरहुत स्तूप का निर्माण और सांची स्तूप की वेदिकाओं (रेलिंग) का विस्तार इसी काल में हुआ था।
  • शुंग काल को ‘संस्कृत भाषा के पुनर्जागरण’ का काल भी माना जाता है।

ऐतिहासिक विवाद

बौद्ध ग्रंथ ‘दिव्यावदान’ में पुष्यमित्र को बौद्धों का उत्पीड़क बताया गया है। हालांकि, कई इतिहासकार इसे अतिशयोक्ति मानते हैं, क्योंकि उनके शासनकाल में बौद्ध स्मारकों का सौंदर्यकरण भी हुआ था। संभवतः यह संघर्ष धार्मिक कम और राजनीतिक अधिक था।

निष्कर्ष

पुष्यमित्र शुंग ने उस समय भारत का नेतृत्व किया जब मगध की सत्ता बिखर रही थी। उन्होंने उत्तर भारत को विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रखा और प्राचीन भारतीय संस्कृति व वैदिक परंपराओं को एक नई दिशा दी। लगभग 36 वर्षों तक शासन करने के बाद 148 ईसा पूर्व में उनका निधन हुआ।

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