भारत में राज्यों का विभाजन भाषा के आधार पर क्यों हुआ ?

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राज्यों का विभाजन भाषा के आधार पर
राज्यों का विभाजन भाषा के आधार पर

इतना तो हम सब जानते ही है की भारत में राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर हुआ। पर लोगो के इस पर अलग अलग तर्क है और धर्म की तरह भाषा भी एक तरह का सब्जेक्ट है जो लोगो की भावना के साथ जुड़ा हुआ है इसलिए इस विषय पे ज्यादा बोलना या लिखना किसी की भावना आहत कर सकता है। मेरी कोशिश यही है की इसको गहराई से समझा जाये। 

मूल भाषा के महत्व को अगर हम समझ जाये तो भाषा की आधार पर राज्यों के गठन का कारन थोड़ा थोड़ा समझ आ जायेगा। भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग सबसे पहले १९३६ में उठी। जब अंग्रेजो में बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों को मिला कर ओडिशा राज्य बनाया। आजादी के बाद ५७१ रियासते भारत में शामिल हुयी जिन्हे राज्यों के रूप में बता जाना जरुरी था साथ ही सवाल था की राज्यों के बाटने का आधार क्या हो। धर्म तो कतई नहीं हो सकता था क्युकी बटवारे के वक्त उसका दंश भारत भुगत चूका था। 

इस सवाल के जवाब को ढूंढने के लिए भारत सरकार ने १९४८ इ जस्टिस s k धर के अध्यक्ष्ता में एक कमिशन का गठन किया लेकिन कमिशन ने भाषा की बजाय प्रशाशनिक सुविधा के आधार बनाने की बात कही। इसके बाद दिसंबर १९४८ में JVP कमिटी बनी इसमें शामिल थे जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल और पट्टावी सीतारमैया। इस कमिटी ने अपनी सिफारिशों में साफ साफ कहा की भाषायी आधार पर राज्यों की मांग अनुचित है और इसे स्वीकार नहीं किया जायेगा। राज्यों का गठन प्रशाशनिक सुविधा को ध्यान में रख कर ही किया जायेगा इस आशय की सिफारिश उस कमिटी ने की। 

राज्यों का विभाजन भाषा के आधार
राज्यों का विभाजन भाषा के आधार

डॉ भीमराव अम्बेडकर भाषा के आधार पे राज्यों के गठन के समर्थक थे लेकिन कुछ शर्तो के साथ। उनका कहना था की राज्यो में सरकारी काम काज की भाषा वही होनी चाहिए जो केंद्र की हो। १९५१ तक दक्षिण भारत में भाषा के आधार पैर राज्यों के गठन की मांग जोर पकड़ने लगी। मद्रास में तेलगू भाषियों का आंदोलन सबसे प्रमुख था। शरुआत में केंद्र सरकार इसे इग्नोर करती रही लेकिन १९५२ में इस आंदोलन के नेता पोत्तू रामलु ने आमरण अनशन की शरुआत की और ५६ वे दिन १५ दिसंबर १९५२ को रामलु की मर्त्यु हो गयी। 

इसके बाद पुरे मद्रास में हिंशक प्रदशर्न शरू हुए तब प्रधानमंत्री नेहरू को अपने मत के विपरीत जाकर भाषा के आधार पे अलग राज्य की मांग को स्वीकार करना पड़ा इसके बाद १ अक्टुम्बर १९५३ को आंध्र प्रदेश भाषा के आधार पर बनने वाला पहला राज्य बना। 

आंध्र प्रदेश के बनते ही भारत के बाकि हिस्सों में भी भाषा के आधार पर राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी। और इस मसले के है के लिए १९५३ में एक नए आयोग का गठन किया गया जिसकी अधयक्षता जस्टिस फज़ल अली कर रहे थे। २ साल बाद फज़ल अली ने अपनी रिपोर्ट पेश की और रिपोर्ट में प्रस्ताव दिया गया की भारत में भाषा के आधार पर १६ राज्यों का गठन किया जायेगा। इसके बाद १९५६ में स्टेट ऑर्गेनाइजेशन एक्ट SRA पास हुआ और १ नोवेम्बर १९५६ के दिन लागु हुआ। 

तब भारत को १४ राज्यों और ६ केंद्रशाषित प्रदेशो में बात दिया गया। दक्षिण में ४ नए राज्यों का गठन किया गया जिसमे आंध्र प्रदेश, केरल, मद्रास और मैसूर। बाद में १९६९ में मद्रास का नाम बदलकर तमिलनाडु और १९७३ में मैसूर का नाम बदल कर कर्णाटक कर दिया गया। दक्षिण माँ मामला सुलझा तो बॉम्बे, पंजाब और उत्तर पूर्व के राज्यों में बखेड़ा खड़ा हो गया। तब गुजरात और महाराष्ट्र अलग अलग राज्य नहीं हुआकरते थे दोनों बॉम्बे में शामिल थे। फिर गुजरातियों और मराठियों ने मांग की की दोनों का अलग अलग राज्य बनानां चाहिए। 

पंजाब में भी शिख अपने लिए अलग राज्य चाहते थे।  लेकिन महाराष्ट्र का मुद्दा इन सब से थोड़ा जयादा कॉम्प्लिकेटेड था और इसका कारन था बॉम्बे सिटी। तीन तरह की मांगे समाने थी। एक धड़ा मांग कर रहा था की बॉम्बे गुजरात में शामिल किया जाये , सयुंक्त महाराष्ट्र परिषद् का कहना था की बॉम्बे महाराष्ट्र से अलग नहीं हो सकता और तीसरा धड़ा बॉम्बे सिटीजन कमिटी जिसमे JRD टाटा जैसे दिग्गज शामिल थे इनकी मांग थी की बॉम्बे शहर को अलग राज्य बनाया जाये। 

बॉम्बे राज्य
बॉम्बे राज्य

बॉम्बे सिटीजन कमिटी की दलील थी की बॉम्बे में पुरे भारत के लोग रहते है और सिर्फ ४३ प्रतिशत ही मराठी भाषी है। जनवरी १९५६ में सयुंक्त महाराष्ट्र परिषद् ने एक बड़ा आंदोलन शरू किया।  बड़े पैमाने पे गिरफ्तारियां हुयी और प्रधानमंत्री नेहरू और तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई के पुतले फुके गए। हालत बिगड़ते देख केंद्र ने निर्णय लिया की विधर्भ और बॉम्बे को एक कर दिया जाये। इस तरह बॉम्बे सेहर बॉम्बे राज्य बना और आगे चल कर १९६० में गुजरात को भी अलग राज्य बना दिया गया। 

पंजाब में तब अकाली दल सीखो के लिए अलग राज्य की मांग कर रहा था। भाषा के आधार पे राज्यों का गठन हुआ तो अकालियों के पंजाबी भाषा बोलने वालो के आधार पर राज्य की मांग कर दी। इस आंदोलन को बड़ी सफलता मिली जब १९६६ को उस वक्त पंजाब पंजाबी भाषियों के लिए और हरियाणा हिंदी भाषियों के लिए बाट दिया गया। आगे चल कर और अलग राज्यों की मांग उठती रही जिसका हालिया उदाहरण २०१४ में आंध्र प्रदेश से अलग हुआ तेलंगाना राज्य है। 

अब आखिरी बात की भाषा के आधार पर राज्यों का बटवारा सही था या नहीं ?

इसका कोई आसान जवाब नहीं है लेकिन कुछ उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है। १९७१ में पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग होने में भाषा एक बड़ा कारन थी। पूर्व पाकिस्तान (बांग्लादेश) के लोग मानते थे की उनपे उर्दू को थोपा जा रहा है जबकि उनकी मूल भाषा बांग्ला थी। श्रीलंका में तमिल और सिंघल संघर्ष आज भी कायम है जिसकी जड़ में मुख्य मुद्दा भाषा ही है। भारत में भाषा के आधार पे राज्यों के गठन के नफे नुकसान हो सकते है लेकिन एक आशंका गलत साबित हुयी की इससे राज्यों की राष्ट्रीय पहचान में कोई कमी नहीं आयी। 

एक बंगाली भी उतना ही भारतीय महसूस करता है जितना की एक मराठी, गुजराती या तमिल करता है। बाकि भाषा चूँकि एक व्यक्तिगत पहचान से जुड़ी हुयी है इसलिए लोगो का इसके लिए अग्रेसिव होना लाजमी है।

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