अडोल्फ हिटलर भारतीयों के बारे में क्या सोचता था ?

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adolf hitler and india
adolf hitler and india

1928 में हिटलर की आत्माकथा mein kampf भारत में पब्लिश हुयी और अगले 90 सालो तक बेस्ट सेलर का हिस्सा बनती रही। दुनियाभर में हिटलर के प्रशंषको की कमी नहीं है लेकिन विशेषरूप से भारत में एक मिथक आम है की हिटलर भारत और भारतीयों का समर्थक था। इस मिथक को बढ़ावा मिलता है तीन कारणों से. 

1 हिटलर की नेताजी सुभाषचंद्र बोस से मुलाकात। 

2 स्वस्तिक चिन्ह का प्रयोग 

3 हिटलर आर्यो यानि भारतीयों को सबसे श्रेष्ठ नस्ल मानता था। 

20 अप्रेल 1889 को हिटलर का जन्म हुआ था। पहले विश्वयुद्ध के बाद जनवरी 1920 को उसे जर्मन वर्कर पार्टी का प्रोपेगेंडा चीफ बनाया गया और आने वाले महीने में उसने पार्टी का नाम नेशनल सोसलिस्ट जर्मन वर्कर पार्टी यही नात्ज़ी पार्टी रख दिया। अप्रेल 1920 में उसने म्यूनिख के एक हॉल में पार्टी वर्कर के सामने एक भाषण दिया जिसमे उसने एक सवाल पूछा की मुट्ठीभर ब्रिटिश ने आधी दुनिया पे राज कायम कैसे किया अब इस सवाल का जवाब भीड़ देती उससे पहले ही वो आगे बोला की हमे यानि जर्मनी को यही करना है। 

इससे एक महीने पहले हिटलर ने कहा था की भारत से कपास और रबर के निर्यात से भारतीयों को चूसा और उन्हें भूखा रहने पे मजबूर किया। क्या उन्हें ऐसा करने का हक़ है। दोनों बाते विरोधाभाषी थी लिहाजा पार्टी वर्कर हो समझ नहीं आया की वो कहना क्या चाहता है तब उसने अपने दोनों सवालों का जवाब दिया एक शब्द से – पावर (शक्ति)

अडोल्फ हिटलर और भारत
अडोल्फ हिटलर और भारत

हिटलर ने कहा की सारा मामला पावर का है। अंग्रेजो के पास ताकत थी इसलिए वो भारत पर राज कर पाए और उन्हें ऐसा करने का हक़ भी है क्युकी जिसके पास ताकत नहीं उसे अधिकार की बात करने का कोई हक़ नहीं। इसके बाद उसने कहा ही जर्मनी के पास कोई अधिकार नहीं क्युकी हमारे पास शक्ति नहीं है। अपनी आत्माकथा में वो इसी बात को एक दूसरे तरीके से लिखता है।  वो कहता है की या तो जर्मनी वर्ल्ड पावर होगा या होगा ही नहीं। 

म्यूनिख पार्टी मीटिंग में उसने एक और सवाल किया की अंग्रेजो के पास इतनी शक्ति कहा से आयी और इसका जवाब देते हुए उसने कहा की नस्ल। ब्रिटिश भारत पर इसलिए राज कर पाए क्युकी वो बेहतर नस्ल के है। अब ये बात चौकाने वाली है की हिटलर आर्यन नस्ल को सबसे बेहतर मानता था और तब इतिहासकार मानते थे की भारत के लोग आर्यन नस्ल के ही है तो फिर हिटलर भारतीयों को अंग्रेजो से नीची नस्ल का कैसे बता रहा था। ये समझने के लिए हमे हिटलर के दो सहयोगियों के विचारो को समझना होगा। इन सहयोगियों में पहला है स्टीवन चेम्बर्लीन और दूसरा अल्फ्रेड रोजनबर्ग। 

स्टीवन चेम्बर्लीन नात्ज़ी पार्टी में एक बड़ा दार्शनिक माना जाता था और वही हिटलर का बौद्धिक गुरु भी था। नस्लीय श्रेष्ठता का विचार हिटलर को चेम्बर्लीन से मिला था। चेम्बर्लीन ये विचार समाज में तब के भोगवाद और भौतिकवाद से झूझ रहे थे और अधोगिक क्रांति ने जीवन स्तर बेहतर कर दिया था और चर्च व् धर्म की शक्ति कम होने लगी थी। अब चेम्बर्लीन के सारे कन्फ्यूज़न का हल मिला नस्लवाढ में। हालांकि चेम्बर्लीन बहुत पहले से ही नस्लवाद का समर्थक रहा था लेकिन जब 1888 में उसको भारतीय धर्मशास्त्र पढ़ने का मौका मिला तो उसने उसी नजर से भारतीय दर्शन को देखना शरू किया। 

थ्योरी तो वो पहले ही बना चूका था वो बस दूसरे माध्यम से अपनी बात के लिए आधार जुटा रहा था। 19 वी शताब्दी के मध्य में विलियम जोन्स नाम के एक ब्रिटिश स्कॉलर ने अपने शोध में संस्कृत ग्रीक और लेटिन भाषा में बहुत सारी समानताये पायी और इन भाषाओ को बोलने वालो को नाम दिया आर्य। ये शब्द जो भारत में वैदिक परम्परा से जुड़ा था इसके बाद वो एक नस्लीय पहचान बन गया। 

डोल्फ हिटलर और चेम्बर्लीन
डोल्फ हिटलर और चेम्बर्लीन

धीरे धीरे और स्कॉलर ने पाया की 40 और ऐसी भाषाएँ थी जिनमे सामान गुण थे और इनमे जर्मन और इंग्लिश भी शामिल थी। तब से ये सवाल उठा के भारत और यूरोप के लोग एक जैसी भाषा कैसे बोलते है। संस्कृत भाषा भी भारोपीय (भारत + यूरोप) भाषा परिवार की थी।  ये विचार भी आम हो चला था की कुछ 1500 साल पहले आर्य भारत में सेंट्रल एशिया से आये थे। इसी विचार को चेम्बर्लीन के आगे बढ़ाते हुए दावा किया की भारत में पहुंचे पहले लोग असल में जर्मन थे और नोडिक नस्ल के ये लोग फादरलैंड यानि जर्मनी से निकल कर एशिया के अलग अलग इलाको में आये थे। 

भारतीय ग्रंथो को पढ़ने के लिए चेम्बर्लीन ने संस्कृत सीखी और वेद और उपनिषद पढ़कर वो बड़ा प्रवभावित हुआ लेकिन इनमे मौजूद कई अच्छी बातो को छोड़ कर जाती वयवस्था को पकड़ लिया। नस्लीय बटवारे के लिए उसको जातिप्रथा उसको बड़ा सरल लग गया जिसमे श्रेष्ठ नस्ल के लोग सबसे ऊपर और कम नस्ल के लोग सबसे निचे थे। उसने दावा किया की श्रेष्ठ नस्ल के आर्यो ने वेदो और उपनिषद को लिखा और बाकि को भौतिकवाद से आगे बढ़ने का दर्शन प्रदान किया।  चेम्बर्लीन ने इसके उदहारण में कालिदास और आचार्य शंकर के लिखे का जिक्र भी किया। 

जिस दूसरे आदमी ने हिटलर को प्रभावित किया वो था अल्फ्रेड रोजनबर्ग। 1920 में हिटलर की मुलाकात अल्फ्रेड रोजनबर्ग से हुयी और हिटलर ने उसको नात्ज़ी पार्टी के मुखपत्र का एडिटर बना दिया। इसी नात्ज़ी पार्टी के मुखपत्र ने नस्लीय श्रेष्ठता का प्रचार प्रसार किया। चेम्बर्लीन की भाती अल्फ्रेड रोजनबर्ग भारतीय इतिहास और संस्कृत भाषा में रूचि रखता था। उसने भी वही सिद्धांत आगे बढ़ाये की घोड़ो पे बैठ कर नीली आँखों वाले जर्मन लोग भारत में चले आये और वहा काले लोगो पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया। उसने फ्रेंच डिप्लोमेट जोशेफ आर्थर की बार दोराहते हुए कहा की जर्मन गोर आर्यन लोग सभी नस्लों से ऊपर है और इन्ही लोगो ने भारत में उपनिषद् जैसे महान दर्शन को जन्म दिया।  

डोल्फ हिटलर और अल्फ्रेड रोजनबर्ग
डोल्फ हिटलर और अल्फ्रेड रोजनबर्ग

रोजनबर्ग ने जाती व्यवस्था को लेके दावा किया की काले मूलनिवासियो को अलग रखने के लिए आर्यो ने वर्णव्यवस्था की शरुआत की। अब वर्ण शब्द का एक अर्थ जाती था और एक अर्थ रंग। वर्तमान यानि 1920 में रोजनबर्ग ने भारतीयों के लिए लिखा की भारतीयों से एक गलती हो गयी वो अध्यात्म के चक्कर में इतना डूब गए की नस्लीय शुद्धता की बनाये रखने के लिए असावधान हुए और आगे चल कर उनका खून काले मुलनिवासिये से मिल गया जिसके चलते नस्लीय श्रेष्ठता समाप्त हो गयी। 

भारत गुलाम क्यों बना इसका कारन भी नस्लीय हीनता को ही बताया गया। रोजनबर्ग ने लिखा नस्लीय मिलावट के चलते सिर्फ ज्ञान बचा और उसके लिए नस्लीय श्रेष्ठता ख़तम हो गयी। इसके बाद जाती प्रथा भी कमजोर होती चली गयी और इसके फलशवरूप आर्य भी कमजोर हुए और उसके लिए रोजेनबर्ग लिखता है की  वो अब नीच लोग आर्यन नहीं रहे। 

भारतीयों को लेके हिटलर के विचार में हम इन नस्लवादी बातो का प्रभाव देख सकते है। 1936 में एक राजनैतिक रैली को सम्बोधित करते हुए हिटलर कहता है की भारतीय चल भी नहीं सकते और अंग्रेजो ने उन्हें सिखाया की चलना क्या होता है। इसके आलावा उसने समय समय पर भारतीयों के लिए नस्लवादी टिप्पणियों का इस्तेमाल भी खूब किया। 1936 की एक और रैली में उसने कहा की भारत में ब्रिटिशराज जर्मनी के लिए एक मॉडल है और इंडिया इस बात का उदहारण है की एक गुलाम नस्ल के साथ कैसे व्यव्हार किया जाता है। 

आजादी के आंदोलन को लेके उसका मत था की ये बेहतर नोडिक नसल के खिलाफ नीची नस्ल के लोगो का विद्रोह था।  इंडियन प्रॉब्लम के बारे में बात करते हुए उसने वायसरॉय लार्ड एवन को सलाह दी थी की गाँधी को गोली क्यों नहीं मार देते। बात सिर्फ गाँधी की नहीं थी हिटलर ये मानता था की भारतीय नीची नस्ल के थे इसलिए उनके खिलाफ कोई भी हिंसा जायज थी। 

अब आखरी बात, सुभाषचंद्र बोस से उनकी मुलाकात का क्या सार था।  तर्क ये दिया जाता है की हिटलर ने भारतीयों की मदद की थी।  मई 1942 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और हिटलर की मुलाकात हुयी थी इससे पहले भी कई बार नेताजी सुभाषचंद्र बोस कोशिश कर चुके थे लेकिन हिटलर उनसे मुलाकात के लिए तैयार नहीं हुआ। भारत की आजादी से उसे कोई विशेष लगाव नहीं था लेकिन अमेरिका युद्ध में उतरा तो ब्रिटेन को उलझाए रखने के लिए भारत की आजादी के आंदोलन पर ध्यान देना शरू किया।  नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ मुलाकात में वो अधिकतर वही बात करता रहा। मुलाकात के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस को ये एहसास हुआ की हिटलर उनके थरु एक प्रोपेगेंडा वॉर जितना चाहता है बजाये की मिलिट्री वॉर के। 

विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों का एक किस्सा है जिसे आपको बेहतर समझ में आएगा की वो भारतीयों के प्रति क्या विचार रखता था। 1942 का साल था और जर्मनी हर के कगार पे खड़ा था और हिटलर के सहयोगी भारत के आंदोलन पे नजर गड़ाए थे। उन्हें ये लग रहा था की भारत में विद्रोह चरम तक पहुंच जायेगा तो ब्रिटेन कमजोर हो जायेगा जो की जर्मनी के विरोधी गट का सहयोगी था। मार्च महीने में हुयी एक कॉन्फ्रेंस में हिटलर के सामने एक जनरल ने आजाद हिन्द फौज का जिक्र किया तब हिटलर ने जवाब दिया की आजाद हिन्द फौज एक मजाक है। भारतीय एक कीड़े को भी नहीं मार सकते अंग्रेजो को तो कतई नहीं मार पाएंगे इसलिए उन्हें अंग्रेजो के सामने खड़ा करना में एक मजाक समझता हूँ। इससे बेहतर तो ये है की उनसे मजदूरी कराई जाये वो इसी लायक है। 

हिटलर को महिमामंडित करने वाले भारतीयों को एक सबक है की उसकी तारीफ करने से पहले जरूर सोचे की वो भारतीयों के बारे में क्या सोचता था। 

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