जानिए कनिष्क का इतिहास

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कनिष्क का इतिहास जीवनी : कनिष्क प्रथम को इतिहास में इनकी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी के रूप में जाना जाता हैं. इनके जन्म और राज्याभिषेक वर्ष के सम्बंध में मतभेद हैं. शिव व कार्तिकेय के भक्त होने के साथ ही ये बौद्ध अनुयायी थे. तथा तुलना गिनती अशोक महान से की जाती हैं. ईसवीं 78 में इन्होंने शक संवत चलाया, जब इन्होने शासन की शुरुआत की थी.

महान भारतीय सम्राट कनिष्क प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शासक रहे हैं ये कुषाण वंश से सम्बन्धित थे कुषाण राजवंश (लगभग 30 ई. से लगभग 225 ई. तक) को विदेशी जाती माना गया हैं जो संभवतः चीन अथवा मध्य एशिया से भारत में आई.

कनिष्क को महान विजेता धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी के रूप में प्रस्तुत किया गया हैं. आज हम कनिष्क की सैन्य, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों के बारे में संक्षिप्त में जानेगे.

पूरा नामकनिष्क प्रथम 
वंशकुषाण
शासनावधिद्वि्तीय शताब्दी
पूर्ववर्तीविम कडफिसेस
उत्तरवर्तीहुविष्क
जन्म98 ईसा-पूर्व पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर)
निधन44 ईस्वी पेशावर
धर्मबौद्धमत

कुषाण भी एक विदेशी जाति थी, जो चीन के पश्चिमोत्तर प्रदेश में निवास करती थी. इस जाति का सम्बन्ध चीन की यू ची जाति की शाखा से था. कैडफिसीस प्रथम कुषाण वंश का प्रथम शासक था. कुषाण वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक कनिष्क था.

जो 78 ई में शासक बना. कनिष्क का साम्राज्य मध्य एशिया से सारनाथ तक विस्तृत था तथा पुरुषपुर (पेशावर) उसकी राजधानी थी. राजतरंगिणी के अनुसार कनिष्क का कश्मीर पर अधिकार था.

कनिष्क बौद्ध विद्वान अश्वघोष के सम्पर्क में आया, जिसके प्रभाव से उसने बौद्ध धर्म अपना लिया. कनिष्क के काल में कुंडल वन में आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति में त्रिपिठ्कों पर टिकाएं लिखी गई  इन्हें एक ग्रंथ महाविभाष में संकलित किया. कनिष्क के समय में बौद्ध धर्म स्पष्ट दो सम्प्रदायों हीनयान व महायान में विभक्त हो गया था.

सम्राट कनिष्क साहित्य एवं कला का आश्रयदाता था, उसकी राजसभा में बुद्धचरित व सौदरानन्द काव्यों के लेखक अश्वघोष, शून्य वाद तथा सापेक्षवाद के प्रवर्तक एवं प्रकांड विद्वान नागार्जुन, पार्श्व तथा वसुमित्र रहते थे. आयुर्वेद के जन्मदाता एवं चरक संहिता के लेखक चरक को भी कनिष्क ने आश्रय दिया था.

कनिष्क के काल में गांधार व मथुरा कला शैलियों का विकास हुआ. शक सम्वत का प्रचलन कनिष्क द्वारा ही किया गया. कुषाण शासक पहले शासक थे, जिन्होंने भारत में सोने के सिक्के ढलवाए. विम कैडफिसिस सोने के सिक्के चलाने वाला पहला भारतीय शासक था.

कनिष्क का इतिहास

कुषाण राजवंश का इतिहास

कनिष्क को कुषाण राजवंश का सबसे प्रतापी और क्रम से तीसरा अथवा चौथा शासक माना जाता हैं. राजनैतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से इनका शासनकाल श्रेष्ठ माना गया हैं. भारत में कुषाण वंश का पहला शासक कडफिसस था जिन्होंने पहली सदी में वर्ष 15 से 65 के मध्य शासन किया था.

मूल रूप से कुषाण जाति मध्य एशिया की यू ची शाखा की जाती थी. जो दूसरी सदी में चीन में निवास करती थी. भारत में आने से पूर्व कुषाणों का शासन बैक्ट्रिया में था जो उत्तरी अफगानिस्तान व दक्षिणी उज्केबिक्स्तान व दक्षिणी तजाकिस्तान का क्षेत्र था. 

यह यूनानी ईरानी संस्कृति का केंद्र था इन्ही भाषा हिन्द ईरानी समूह की थी. ये मिहिर अर्थात सूर्य के उपासक थे. कनिष्क से पहले के शासक शैव अनुयायी थे. कनिष्क भी शिव व कार्तिकेय की पूजा करता था. उसने मुल्तान में एक सूर्य मन्दिर भी बनवाया.

कनिष्क प्रथम (TKanishka Kanishka I)

सम्राट कनिष्क के इतिहास पूर्ववर्ती परवर्ती शासकों और कालक्रम के सम्बंध में कोई स्पष्टता नहीं थी. मगर अफगानिस्तान से मिले राबाटक शिलालेख ने इतिहासकारों को एक स्पष्ट दृष्टि दे दी. शिलालेख के अनुसार कनिष्क ने कुजुल और विम के बाद शासन किया.

इस शिलालेख में कनिष्क की वंशावली ज्ञात हो जाती हैं. लेख में कनिष्क को देवपुत्र की उपाधि दिए जाने की बात भी मिलती हैं साथ ही उसे विम कैडफिसस का बेटा भी बताया गया हैं.

कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि (Kanishka the Date of Ascension of the First Kanishka)

भारत के महान सम्राटों में कनिष्क की गिनती की जाती हैं. उनकी महान राजनैतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण इतिहास में कुषाण वंश को महत्वपूर्ण स्थान मिलता हैं. मगर कुषाण युग के सम्पूर्ण तिथिक्रम आज भी इतिहासकारों के लिए एक जटिल प्रश्न बना हुआ हैं.

जानकर ताज्जुब होगा कि कनिष्क के राज्याभिषेक और शासनावधि के विषय में चार धारणाएं प्रचलन में हैं. जिनके बीच का अंतर एक दो वर्ष नहीं बल्कि तीन सौ वर्षों का हैं. अभी तक विद्वान् किसी एक तिथि निर्धारण पर एकमत नहीं हैं. प्रमुख धारणाएं इस प्रकार हैं.

  • पहला मत– इसके अनुसार कनिष्क को प्रथम सदी ईसा पूर्व में रखते है तथा राज्यारोहण वर्ष 58 ई पू मानते हुए यह भी कहते है कि उन्होंने शक संवत की शुरुआत की जो कालान्तर में विक्रम संवत के रूप में जाना गया.
  • दूसरा मत– स्मिथ मार्शल, थोमस और स्टेनकेनो आदि इतिहासकार कनिष्क को दूसरी सदी का सम्राट मानते हैं. इनके अनुसार कनिष्क का शुरूआती समय द्वितीय शताब्दी ई. में 120-125 ई. था. 
  • तीसरा मत– रमेशचंद्र मजूमदार एवं राधागोविंद भंडारकर जैसे इतिहासकार कनिष्क को तीसरी सदी में रखते है तथा उनका राज्यारोहण 248 तथा 278 ई. को मानते हैं.
  • चौथा मत– अधिकतर विद्वान कनिष्क के प्रथम सदी के मत को मानते हैं. इस मत के अनुसार कनिष्क ने 78 ई. में जिस संवत् की स्थापना की थी, तक्षशिला उत्खनन में मिले साक्ष्य भी इस मत को और पुख्ता करते हैं.

कनिष्क की विजयें (Kanishka’s conquests) 

कुषाण राजवंश का उत्कर्ष कनिष्क प्रथम का राज्यकाल ही था. जब कनिष्क शासक बना उस कुषाण साम्राज्य का विस्तार अफगानिस्तान, बैक्ट्रिया, पर्थिया का क्षेत्र शामिल था. कनिष्क ने साकेत और पाटलीपुत्र के शासकों के साथ युद्ध किया. 

कश्मीर को अपने राज्य में मिलाकर कनिष्कपुर नामक नगर की स्थापना की उज्जैन के क्षत्रप को हराकर मालवा को जीता. कनिष्क ने चीन के साथ दो लड़ाई लड़ी. पहले युद्ध में हारकर दूसरे में विजय हासिल की. मध्य एशिया के कई प्रान्त काश्गर यारकंद और खेतान के क्षेत्रों पर भी कनिष्क ने अपना शासन स्थापित किया.

पार्थिया से युद्ध

चीनी साहित्य में कनिष्क और पार्थिया के राजा नान सी के युद्ध का वर्णन हैं. नान सी ने कनिष्क पर आक्रमण किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली हार का मुहं देखना पड़ा था. 

कुषाण साम्राज्य का विस्तार चीन और मध्य एशिया तक फैला था, इससे पूर्व प्राचीन भारत में किसी भी राजवंश का इतना बड़ा अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्य नहीं था. मध्य एशिया में रोमन और पार्थियन साम्राज्य उभर रहे थे.

दोनों में आपसी शत्रुता थी. रोमन चीन के साथ व्यापार करने के लिए कुषाणों के साथ मैत्री सम्बन्ध रखते थे. क्योंकि पार्थियन साम्राज्य को छोड़कर एरियाना बैक्ट्रिया आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कनिष्क का शासन था. व्यापारिक मार्ग को लेकर दोनों के बीच युद्ध हुआ और इसमें कुषाण विजयी हुए.

पंजाब और मगध की विजय

कनिष्क पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत को छोड़कर सभी क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य जमा चूका था. इन्होने अपने अभियान की शुरुआत कश्मीर और आसपास के क्षेत्र से की. 

बौद्ध ग्रंथ श्रीधर्मपिटकनिदान सूत्र के विवरण के अनुसार कनिष्क ने पाटलिपुत्र को जीता और प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् अश्वघोष और भगवान बुद्ध के कमंडल को प्राप्त किया. तिब्बत की श्रुतियों में कनिष्क के अयोध्या विजय का विवरण भी मिलता हैं.

चीन से संघर्ष

लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारत में अपनी विजय पताका फहराने के पश्चात भी कनिष्क अपने राज्य विस्तार से संतुष्ट नहीं था, मध्य एशिया में चीनी साम्राज्य पान चाऊ के नेतृत्व में फ़ैल रहा था. 73-78 ई. में चीनी विस्तारवाद कैस्पियन सागर तक फ़ैल चूका था.

कनिष्क ने अपने राजदूत को पान चाऊ के पास मैत्री सम्बन्ध के लिए भेजा साथ ही चीनी सम्राट की बेटी से विवाह करने की इच्छा भी जताई. इससे क्रुद्ध होकर पान चाऊ ने कनिष्क पर चढाई कर दी और कुषाणों को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा.

पान चाऊ की मृत्यु के बाद कनिष्क ने अपना प्रतिशोध लेने के लिए चीनी सेना पर धावा बोला और मध्य एशिया के कई प्रान्त यारकंद, खोतान और काशगर को जीत लिया. 

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